भारत के गर्म और उमस भरे मौसम में, और विशेषकर लंबी यात्राओं के बीच, हाइड्रेशन अक्सर पीछे छूट जाता है। पर्याप्त पानी न पीना दिन के मध्य में थकान का एक बहुत बड़ा, लेकिन अदृश्य कारण है।
इसके अलावा, सुबह का नाश्ता (Breakfast) छोड़ना और सीधा एक भारी लंच करना हमारे पाचन तंत्र पर अतिरिक्त बोझ डालता है। जब हम लंबे समय तक भूखे रहते हैं और फिर अचानक भारी खाना खाते हैं, तो शरीर की ऊर्जा भोजन पचाने में लग जाती है, जिससे हमें नींद आने लगती है।
उठने के बाद एक गिलास पानी और हल्का, सुपाच्य नाश्ता दिन की सही शुरुआत करता है।
बाज़ार के तले हुए भारी भोजन के बजाय घर का बना ताज़ा खाना ऊर्जा को स्थिर रखता है।
हमारा 'ऑफ़िस कल्चर' अक्सर हमें कंप्यूटर के सामने घंटों तक एक ही मुद्रा में बैठने पर मजबूर कर देता है। शाम 5 बजे तक, मानसिक तनाव और शारीरिक स्थिरता मिलकर एक गहरी थकान को जन्म देते हैं।
इस समय एक कप कड़क चाय (Chai) और समोसा, कचौड़ी या कोई अन्य मीठा स्नैक बहुत आकर्षक लगता है। हालांकि यह स्नैक तुरंत आराम और ऊर्जा का एहसास कराता है, लेकिन कुछ ही समय बाद ऊर्जा का स्तर पहले से भी नीचे गिर सकता है।
छोटा सा बदलाव: अपनी डेस्क से उठकर थोड़ा टहलना, आँखों को आराम देना, और भारी तले हुए स्नैक्स की जगह भुने हुए चने या फल चुनना शाम की थकान को काफी हद तक कम कर सकता है।
सप्ताह के अंत में हम अक्सर देर से सोते हैं और देर से उठते हैं। खाने का समय भी अनियमित हो जाता है। यह अचानक बदलाव शरीर की आंतरिक घड़ी (body clock) को भ्रमित कर देता है, जिसे 'सोशल जेटलैग' (Social Jetlag) भी कहा जाता है। यही कारण है कि सोमवार की सुबह सामान्य से अधिक थकावट भरी और चिड़चिड़ी लगती है।
भारतीय शहरों में ट्रैफिक, शोर और भीड़ के बीच हर दिन 1-2 घंटे बिताना मानसिक रूप से बहुत थकाने वाला होता है। घर पहुँचने तक आपका शरीर पूरी तरह से आराम की मांग करता है। सफर के दौरान कोई पॉडकास्ट सुनना, हल्का संगीत सुनना या बस आँखें बंद करके गहरी सांसें लेना इस यात्रा के तनाव को कुछ कम कर सकता है।
भारतीय परिवारों में रात का खाना अक्सर दिन का सबसे भारी और गरिष्ठ भोजन होता है, और कई बार यह सोने के ठीक पहले खाया जाता है। यह पाचन तंत्र को रात भर काम करने पर मजबूर करता है, जिससे नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है। रात का खाना हल्का और सोने से कम से कम 2 घंटे पहले खाना सबसे आदर्श माना जाता है।